वर्तमान में सफलता।।
मैंने ऐसी बहुत सारी कहानियाँ सुनी है, जिसमे सफल होने के लिए लोगों को बहुत सारे कष्ट झेलने पड़े, कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। मैं ऐसे बहुत सारे सफल व्यक्तियों से मिली भी हूँ जो कई बार असफल हुए, लोगों का तिरस्कार भी सहा और अंत मे असफलता उनके प्रयाशों से हार गयी।।
सफल व्यक्ति अपनी सफलता से असफलता की लंबी से लंबी दास्तान को भी प्रेरणा बना देता है। निःसंदेह उनलोगों को भी अक्सर लोगों की मीठी जुबान में बोले गए शब्द तीर की भांति चुभे होंगे। अक्सर आश्वाशन और सलाह में फर्क करना बहुत मुश्किल लगा होगा।
कठिन परिश्रम के साथ सच्चाई , अच्छाई , नेकी औऱ ईमानदारी के रास्ते सफर को बहुत लंबा और मुश्किल बना देते है ,परंतु प्राप्त सफलता के आगे वो चंद मुश्किले पाँव में कील नही accupresure वाला सुखद अनुभव कराती है।
लेकिन क्या वर्तमान परिपेक्ष्य में यह सफलता को परिभाषित करता है??....
एक बार कक्षा में पाठ की समाप्ति पर एक छात्रा ने कहा, पाठ में निहित जो अर्थ होंते है, जैसे हमें झूठ नहीं बोलना चाहिए, दूसरों को नीचा नहीं दिखाना चाहिए गंदगी नहीं फैलानी चाहिये इत्यादि।
क्या हमलोग पाठ में निहित अर्थ से वाकई में सीख लेते हैं!? इस सवाल ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। यह सवाल सिर्फ सवाल नहीं था। असल मे यह तो जवाब था कि हमारा आज का समाज किस ओर जा रहा है।।
सवाल काफी सरल शब्दों में पूछा गया एक अत्यन्त कठिन सवाल था। उपर्युक्त जवाब की तलाश के दौरान मैंने पाया की, सच का सच बने रहना सबसे कठिन है। कुछ अवधारणाओं ने लोगो की मौलिकता को पछाड़ा है। जैसे..
1. कम से कम काम कैसे किया जाये।
2.'कर्तव्य' सिर्फ स्वयं के लिए और 'कार्यभार' दूसरों के लिए वर्गीकृत कर दिए जाए।
3. उदाहरण वैसे दिए जाए जिसमें उसके सही होने ज्यादा कितने लोग उस नीति को अपना रहे है, यह महत्वपूर्ण हो।
4. लोगों में इतनी हिम्मत तो होनी चाहिए कि वे बुद्धिमानी से जालसाजी कर सकें।
5.मदद हमेशा आदान- प्रदान की संभावना को मद्देनजर रख कर किया जाए।
6. केवल सफल हो जाना भी तो सटीक तरीके से सफल होने के ही बराबर है।
7. दूसरों से काम निकलवाना और खुद को छुटकारा दिलाने से बड़ी उपलब्धि कुछ हो ही नही सकती।
8. बिना फायदे के हम कुछ भी न करें।
9. हम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा वे हमारे साथ करते हो।
10. अपना दोष दूसरों के मत्थे मढ़ना ओर हर प्रकार की विफलता के लिए एक मुनासिब वजह और बहाना बनाना आता हो।
11. हम आजकल सब कुछ यह सोचकर करते है कि यह अल्पकालिक है।
(इन 11 बिन्दुओ को पढ़ कर शायद हँसी आ जाये। शायद यह भी लगे कि मुझमें ये सब तो नहीं है या मैं ऐसा नही करता/ करती हूँ। लेकिन गहनता से इन बिन्दुओ को गौर करने पर आपको यह अपने आस- पास अवश्य दिखाई देगी। संभव है कि ये आपकी नही, लेकिन यह आज की समस्या है।)
हम सफल तो हो रहें है, लेकिन सफल होने का तरीका अब बहुत बदल चुका है। इसीलिये अब वैसे बहुत कम लोग बचे हैं जिनकी मेहनत उनके सिक्कों से ज्यादा बोल जाए।
जिनकी लगातार हार उनको जीत तक लेकर जाए।
जो गिरकर भी उठकर सम्हल जाए।
जो सच्चे होकर न पछताएं।
जिन्हें दूसरों के लिए जीना आता हो।
जिन्हें दूसरों को ऊँचा उठाना आता हो।
जिन्हें सबकी खुशी में खुश होना भाता हो
सबके दुःख से जिनका नाता हो।
जो खुद उदाहरण बन जाये।
और दूसरों के दिलों में समा जाए।
©आकांक्षा मिश्रा।
सफल व्यक्ति अपनी सफलता से असफलता की लंबी से लंबी दास्तान को भी प्रेरणा बना देता है। निःसंदेह उनलोगों को भी अक्सर लोगों की मीठी जुबान में बोले गए शब्द तीर की भांति चुभे होंगे। अक्सर आश्वाशन और सलाह में फर्क करना बहुत मुश्किल लगा होगा।
कठिन परिश्रम के साथ सच्चाई , अच्छाई , नेकी औऱ ईमानदारी के रास्ते सफर को बहुत लंबा और मुश्किल बना देते है ,परंतु प्राप्त सफलता के आगे वो चंद मुश्किले पाँव में कील नही accupresure वाला सुखद अनुभव कराती है।
लेकिन क्या वर्तमान परिपेक्ष्य में यह सफलता को परिभाषित करता है??....
एक बार कक्षा में पाठ की समाप्ति पर एक छात्रा ने कहा, पाठ में निहित जो अर्थ होंते है, जैसे हमें झूठ नहीं बोलना चाहिए, दूसरों को नीचा नहीं दिखाना चाहिए गंदगी नहीं फैलानी चाहिये इत्यादि।
क्या हमलोग पाठ में निहित अर्थ से वाकई में सीख लेते हैं!? इस सवाल ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। यह सवाल सिर्फ सवाल नहीं था। असल मे यह तो जवाब था कि हमारा आज का समाज किस ओर जा रहा है।।
सवाल काफी सरल शब्दों में पूछा गया एक अत्यन्त कठिन सवाल था। उपर्युक्त जवाब की तलाश के दौरान मैंने पाया की, सच का सच बने रहना सबसे कठिन है। कुछ अवधारणाओं ने लोगो की मौलिकता को पछाड़ा है। जैसे..
1. कम से कम काम कैसे किया जाये।
2.'कर्तव्य' सिर्फ स्वयं के लिए और 'कार्यभार' दूसरों के लिए वर्गीकृत कर दिए जाए।
3. उदाहरण वैसे दिए जाए जिसमें उसके सही होने ज्यादा कितने लोग उस नीति को अपना रहे है, यह महत्वपूर्ण हो।
4. लोगों में इतनी हिम्मत तो होनी चाहिए कि वे बुद्धिमानी से जालसाजी कर सकें।
5.मदद हमेशा आदान- प्रदान की संभावना को मद्देनजर रख कर किया जाए।
6. केवल सफल हो जाना भी तो सटीक तरीके से सफल होने के ही बराबर है।
7. दूसरों से काम निकलवाना और खुद को छुटकारा दिलाने से बड़ी उपलब्धि कुछ हो ही नही सकती।
8. बिना फायदे के हम कुछ भी न करें।
9. हम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा वे हमारे साथ करते हो।
10. अपना दोष दूसरों के मत्थे मढ़ना ओर हर प्रकार की विफलता के लिए एक मुनासिब वजह और बहाना बनाना आता हो।
11. हम आजकल सब कुछ यह सोचकर करते है कि यह अल्पकालिक है।
(इन 11 बिन्दुओ को पढ़ कर शायद हँसी आ जाये। शायद यह भी लगे कि मुझमें ये सब तो नहीं है या मैं ऐसा नही करता/ करती हूँ। लेकिन गहनता से इन बिन्दुओ को गौर करने पर आपको यह अपने आस- पास अवश्य दिखाई देगी। संभव है कि ये आपकी नही, लेकिन यह आज की समस्या है।)
हम सफल तो हो रहें है, लेकिन सफल होने का तरीका अब बहुत बदल चुका है। इसीलिये अब वैसे बहुत कम लोग बचे हैं जिनकी मेहनत उनके सिक्कों से ज्यादा बोल जाए।
जिनकी लगातार हार उनको जीत तक लेकर जाए।
जो गिरकर भी उठकर सम्हल जाए।
जो सच्चे होकर न पछताएं।
जिन्हें दूसरों के लिए जीना आता हो।
जिन्हें दूसरों को ऊँचा उठाना आता हो।
जिन्हें सबकी खुशी में खुश होना भाता हो
सबके दुःख से जिनका नाता हो।
जो खुद उदाहरण बन जाये।
और दूसरों के दिलों में समा जाए।
©आकांक्षा मिश्रा।
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