बदले -बदले अंदाज।

बचपन के दिनों में जब चोट लग जाती थी तब डेटॉल ओर कॉटन खुद चल कर आ जाते थे। अब या तो खुद चल कर डेटॉल ओर कॉटन लेनी पड़ती है या जरूरत को ही भुलाना पड़ता है।
वो भी क्या दिन थे जब पड़ोस की सारी औरते घर की चौखट पे शाम को बैठ कर गप्पे लड़ाती किसी अपने के आने की राह देख रही होती थी, ओर मोहल्ले के बच्चे  तब तक खेलते जब तक पापा घर नही आ जाते। ये उन दिनों की बात है जब एक कमाता ओर चार लोग खाते थे वो भी एक टेबल पर......
तब पूरे मोहल्ले में एक टेलीफोन और एकाद रेफ्रिजरेटर हुआ करता था ओर पूरा मोहल्ला ठंडा पानी पीता था।तब जरूरते कम थीं और प्रेम ज्यादा।
धीरे धीरे जरूरते बढ़ते गयी और प्रेम तो बस इंटरनेट का मोहताज हो गया। अब बालकनी ओर झरोखे  तो बस धूल फाँकते नजर आते है।
"चारदीवारी में जिंदगी इस कदर कैद हो गयी है की कमरों की चंद कदमो की दूरियाँ मीलों से लगने लगी है।"पहले दिल से खुशियां तलाशते थे,लम्हो को अपना बनाते थे अब तो मुस्कुराते चेहरे की एहमियत भी वह तस्वीरे तय करती है जो कैमरे के सामने ऊपरी मुस्कान से सजाई जाती है।साहब! अब तो पेट पकड़कर हँसना भूल ही गये है, ना हसाने वालें रिस्तेदार आते है ओर ना हँसने वाले साथ बैठते है । चुटकुले  हल्की मुस्कान में  अब अकेले में  गुजर जाती है! सबकुछ बदल गया इन चंद सालों में.…..
पहले एक की कमाई से संयुक्त परिवार चलता था, बेरोजगारी का रोना कम था अब तो सब के सब कमाते है और बेरोजगारी है कि बढ़ती ही जा रही है...
और हम कहते है....मेरा देश बदल रहा है...आगे बढ़ रहा है।

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