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अपनापन

एक एहसास ऐसा भी जहाँ शब्द शब्द टेक देता है। जताना सीखा नहीं पिता के लिए जो सम्मान है और माँ के होने का जो अभिमान है भाई की तरक्की का जो गुमान है और बहन के साथ प्रेम का जो परिमाण है। कभी दुआओं को अभिव्यक्ति का रूप नहीं दिया कभी इनका धन्यवाद नहीं किया। मलाल भी नहीं कि इनसे इतना लिया और बदले में कुछ भी नहीं दिया। सभी तौर- तरीके सीखे है जिनसे फिर भी तहजीब से पेश नहीं आये कभी उनसे उनकी अच्छाइयों को कभी नहीं कहा उनसे फिर भी सबसे सच्चा रिश्ता है उनसे।